
पड़ोसी देश पाकिस्तान एक बार फिर अपनी आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक बदहाली से ध्यान भटकाने के लिए भारत को निशाना बना रहा है।
इस बार जुबानी हमलों की अगुवाई खुद पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने की है।
जब घरेलू मोर्चे पर हालात बिगड़ते हैं, तब इस्लामाबाद का पारंपरिक फार्मूला सामने आता है— भारत को दोष दो, राष्ट्रवाद उछालो, सवाल दबाओ।
ISPR की भाषा पर उठे सवाल
इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के डायरेक्टर जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत को लेकर आक्रामक बयान दिया।
उन्होंने कहा—
“साल 2026 कैसा होगा, यह इस पर निर्भर करता है कि हम कैसे रिएक्ट करते हैं… भारत आपके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेगा।”
उनके बयान की भाषा और लहजे को लेकर सोशल मीडिया से लेकर रणनीतिक हलकों तक आलोचना हो रही है। याद दिला दें कि यही अधिकारी पहले भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अनुचित व्यवहार को लेकर विवादों में रह चुके हैं।
डिप्लोमेसी जब स्लोगन में बदल जाए, तो संदेश नहीं—सिर्फ शोर बचता है।
भारत को घेरने की पुरानी स्क्रिप्ट
चौधरी ने एक बार फिर अफगानिस्तान, नई दिल्ली और TTP को एक ही साजिश का हिस्सा बताने की कोशिश की— वही पुरानी थ्योरी, जिसमें हर संकट का जवाब बाहर खोजा जाता है।
इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी ऐसे ही आरोप लगा चुके हैं।
‘Child Spy’ नेटवर्क का आरोप
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI पर अब भारत में नाबालिग बच्चों को जासूसी के लिए फंसाने के गंभीर आरोप हैं।

जानकारी के मुताबिक— 37 से अधिक नाबालिग सुरक्षा जांच के घेरे में हैं इनमें 12 पंजाब-हरियाणा से 25 जम्मू-कश्मीर से बताए जा रहे हैं इन बच्चों की उम्र 14 से 17 साल के बीच बताई गई है। आरोप है कि ऑनलाइन संपर्क, ब्रेनवॉश और फिर सुरक्षा प्रतिष्ठानों की फोटो-वीडियो मंगवाने का दबाव बनाया गया।
यह जासूसी नहीं, बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
Lashkar-e-Taiba की खुली धमकी
इस बीच लश्कर-ए-तैयबा की ओर से भी भारत के खिलाफ बयानबाज़ी तेज हुई है। बहावलपुर में संगठन के एक शीर्ष चेहरे द्वारा हिंसा के लिए उकसाने और भारतीय नेतृत्व को निशाना बनाने जैसी बातें सामने आई हैं।
ऐसे बयान अक्सर रणनीतिक दबाव बनाने और कट्टरपंथी समर्थकों को सक्रिय रखने के लिए दिए जाते हैं।
भारत के खिलाफ बयानबाज़ी, आतंकी संगठनों की धमकियां और बच्चों को कथित तौर पर जासूसी में झोंकने के आरोप— ये सब संकेत देते हैं कि पाकिस्तान की समस्या बाहर नहीं, अंदर है।
जब शासन कमजोर होता है, तो भाषा ज़्यादा आक्रामक हो जाती है।
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